राजनीतिक

इंदिरा की तरह थे संजय गांधी, कांग्रेस में इंदिरा का विकल्प और राजनीति में उनकी विरासत

 
नई दिल्ली 

 देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी का 23 जून 1980 को विमान दुर्घटना में निधन हो गया था. संजय गांधी को इंदिरा गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर ही नहीं बल्कि विकल्प के रूप में देखा जाता था. संजय गांधी के निधन से कांग्रेस ही नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के सारे समीकरण ही बदल गए थे. संजय गांधी की टीम के नेता आज भी कांग्रेस में मजबूती के साथ प्रासंगिक बने हुए हैं.

इंदिरा की तरह थे संजय गांधी

वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता कहते हैं कि संजय गांधी को राजनीति में लाने की मुख्य वजह या हालात शायद खुद इंदिरा गांधी और उनके काम करने के ​तरीकों में निहित थी. इंदिरा गांधी किसी काम को एक खास तरीके से करने में यकीन रखती थीं और यही खूबी संजय गांधी के अंदर भी थी. इंदिरा की तरह ही संजय गांधी भी अपने निर्णयों पर अडिग रहने वाले शख्स थे. वो अगर किसी चीज को करने की ठान लेते थे तो फिर किसी की भी नहीं सुनते थे. इंदिरा गांधी की कसौटी पर संजय गांधी खरे उतरे, क्योंकि वे बखूबी जानते थे कि कौन-सा काम किससे और कैसे कराया जा सकता है.

आलोक मेहता कहते हैं कि संजय गांधी को भारत में कई लोकतांत्रिक संस्थाओं को खत्म करने या कमजोर करने का भी जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन इंदिरा गांधी को आपातकाल की सलाह सिद्धार्थ शंकर रे ने दी थी. संजय गांधी ने जरूर राजनीति में आते ही परिवार नियोजन जैसे कुछ ऐसे प्रोग्राम शुरू किए थे, जिसे लेकर उनकी अलोचना हुई, लेकिन आज छोटा परिवार, सुखी परिवार की परिकल्पना के साथ-साथ जनसंख्या नियंत्रण को लेकर सभी चिंता जता रहे हैं. इस बात को संजय गांधी ने पांच दशक पहले समझ लिया था.

आलोक मेहता कहते हैं कि कांग्रेस को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए संजय गांधी ने अपने पांच सूत्री कार्यक्रम पेड़ लगाने की योजना को प्रमुख स्थान दिया था, जिससे पार्टी को जबरदस्त फायदा हुआ. शहरों के सौंदर्यीकरण की बात हो या वयस्क शिक्षा की बात हो संजय गांधी के इन फैसलों से 'न्यू इंडिया' बनाने की आधारशिला 70 के दशक में रख दी थी. अलोक मेहता कहते हैं कि संजय गांधी जमीनी नेता थे और उन्होंने जिस तरह से अपनी युवा टीम बनाई थी, उसके दम पर संजय गांधी ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी कराई थी.

युवाओं को जोड़ने में संजय गांधी की अहम भूमिका

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तारिक अनवर कहते हैं कि संजय गांधी की आम छवि कम बोलने वाले मुंहफट शख्स की थी, लेकिन वो स्पष्टवादी नेता थे. आज चापलूसों का जमाना है, हर राजनीतिज्ञ मीठी बातें करता है, मैं समझता हूं, वो उससे हट कर थे. इसलिए उनकी छवि बनाई जाती थी कि वो रूखे हैं, जो कि वो बिल्कुल नहीं थे. हालांकि, ये बात जरूर थी कि जो बात उनको ठीक लगती थी, उसको वो मुंह पर कह जरूर देते थे.

तारिक अनवर कहते हैं कि मौजूदा दौर में जिस तरह से राहुल गांधी की छवि को डैमेज करने की कोशिश हो रही है, वैसे ही संजय गांधी की इमेज को भी बिगाड़ने की कवायद की गई थी जबकि वो एक संघर्षशील और व्यवहार कुशल नेता थे.1977 से 80 के बीच कांग्रेस के जनाधार को वापस पार्टी में लाने खासकर युवाओं को पार्टी से जोड़ने में संजय गांधी ने अहम भूमिका अदा की थी. उन्होंने एक टीम बनाई और जिसे बाद में अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई थी. संजय गांधी की युवा टीम के संघर्ष ने जनता पार्टी को हिलाकर रख दिया था.

युवा नेताओं की संजय गांधी बनाई टीम

शकील अख्तर कहते हैं कि 1977 में कांग्रेस की हार के बाद संजय गांधी को पता था कि उनकी मां इंदिरा गांधी आसानी से हार मानने वाली नहीं हैं. हालांकि उस वक्त के हालात हार मानने जैसे बन गए थे और संजय नहीं चाहते थे कि ऐसा हो. तब उन्होंने सोचा कि उन्हें अपनी मां के लिए जनसमर्थन जुटाना चाहिए. इससे न केवल मां को सहारा मिलेगा बल्कि उनके विरोधियों के भी हौसले पस्त होंगे.

संजय गांधी ने अपने अपने दोस्तों और यूथ नेताओं की एक टीम बनाई थी, जिसे 'संजय ब्रिगेड' भी कहा गया. इसी टीम की बदौलत संजय गांधी ने अपनी मां के 1977 के चुनावों की हार का 1980 लोकसभा चुनावों में भारी जीत से बदला लेने में काफी अहम भूमिका निभाई. 1980 में सत्ता में आने के बाद लोकसभा में उन्होंने जबरदस्त स्पीच दी और अटल बिहारी वाजपेयी की जमकर आलोचना की थी, जिस पर वाजपेयी ने कहा था कि युवा नेता को ऐसे ही बोलना चाहिए.

वरिष्ठ पत्रकार शकील अख्तर कहते हैं कि संजय गांधी तेजी से फैसले लेने के लिए जाने जाते थे. अतिक्रमण हटाने और जमाखोरी के खिलाफ संजय गांधी ने कदम उठाया था जबकि ऐसे कामों में हाथ डालने की किसी राजनेता में हिम्मत नहीं दिखाई दी. संजय आदमी को पहचानने और उनके लिए कोई भी कदम उठाने से हिचकते नहीं थे, यही खूबी इंदिरा गांधी के अंदर भी थी. संजय गांधी स्वयं किसी चीज को करने के लिए हां कहते थे, तो उसको करने का पूरा प्रयास करते थे. उसी तरह से वो आशा करते थे कि जो भी कोई बात करे, तो उसे पूरा करने की कोशिश जरूर करे.

संजय गांधी के रूप में एक रणनीतिकार भी खोया

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि संजय गांधी एक नेता ही नहीं बल्कि कांग्रेस के बेहतर रणनीतिकारों के तौर पर भी थे. संजय गांधी ने अपनी रणनीति से राजनारायण और चौधरी चरण सिंह जैसे नेताओं को साधकर मोरारजी देसाई को बदल दिया था. इतना ही नहीं आपातकाल के दौरान जो कांग्रेस नेता पार्टी छोड़ गए थे उन्हें संजय गांधी 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close