छत्तीसगढ़

कोल ब्लाकों कि नीलामी का विरोध और कमर्शियल माइनिंग नीति वापस लेने की मांग

रायपुर
जल, जंगल, जमीन के संरक्षण और आदिवासी, किसान मजदूरों के अधिकारों पर कार्यरत देश भर के जन आंदोलनों ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर मोदी सरकार द्वारा कमर्सियल उपयोग हेतु कोल ब्लाकों कि नीलामी का विरोध किया. नीलामी की यह प्रक्रिया आदिवासियों के सांवैधानिक अधिकारों को कुचलकर कार्पोरेट मुनाफे के लिए उन्हें विस्थापन के लिए मजबूर करेगी. देश के समृद्ध वनों का विनाश होगा जो न सिर्फ पर्यावरण बल्कि लाखो लोगों के टिकाऊ आजीविका को नष्ट करेगा .

ज्ञात हो कि मोदी सरकार 18 जून से 80 कोल ब्लॉको को व्यावसायिक उपयोग के लिए नीलाम करने जा रही है, जोकि अब तक की सबसे बड़े नीलामी का प्रयास है. कमर्शियल माइनिंग की इस नीति ने बहुमूल्य कोयले संसाधन को मात्र एक बाजारी वस्तु मात्र बना दिया है – जिसमें देश की कोयला जरूरतों, जन-हित, उससे जुड़े पर्यावरणीय तथा सामाजिक न्याय के प्रश्नों की कोई जगह नहीं है.

सूप्रीम कोर्ट ने 2014 में कोलगेट मामले में अपने निर्णय में स्पष्ट कहा था की यह राष्ट्रीय संपदा है जिसमें सरकार की भूमिका केवल एक “अभिरक्षक” की है, असली मालिक देश कि जनता है. परंतु अपनी सारी जिम्मेदारियाँ त्याग कर मोदी सरकार ने राष्ट्र-निर्माण और जन-हित को कॉर्पोरेट मुनाफे के आगे दांव पर लगा दिया है जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मंशा के पूर्णता: खिलाफ है.

साथ ही पूरी प्रक्रिया में राज्य सरकारों कि भूमिका को नगण्य कर दिया गया है. नई कमर्शियल नीति के प्रावधानों, और प्राकृतिक संकट के समय में इस नीलामी प्रक्रिया, से स्पष्ट है कि यह सिर्फ कुछ चुनिन्दा निजी कंपनियों को मुनाफा पहुंचाने कि एक साजिश है जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. इसके सबसे गंभीर दुष्परिणाम सघन वन क्षेत्रों के विनाश, पर्यावरण के अपरिवर्तनीय नुकसान, तथा आदिवासी समुदायों के विस्थापन पर पड़ेंगे.

सरकार के विभिन्न दस्तावेज़,कोल इंडिया लिमिटेड vision-2030,CEA के प्लैन, इत्यादि पहले ही कह चुके हैं कि देश कि कोयला जरूरतों के लिए और किसी खदान के आवंटन कि ज़रूरत नहीं है. कोल इंडिया लिमिटेड के अपने योजना, और वर्तमान में आवंटित खदानें, भारत के अगले 10 वर्षों कि जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है तो फिर ये नीलामी क्यों? ज़ाहिर है इस नई नीलामी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव है जिसके कारण कॉर्पोरेट को नई उम्मीद जागी है – यह खदाने किसी अंत-उपयोग परियोजना के लिए नहीं बल्कि कमर्शियल उपयोग के लिए दी जा रही हैं, जिसमें कंपनियां बिना रोक-टोक मनमानी कर निजी मुनाफा कमाने के लिए स्वतंत्र हैं. यह देश की बहुमूल्य संपदा का बंदरबांट है और आने वाली पीढ़ियों के साथ छल है.

कोविड के इस संकट में जब विश्व कि अर्थव्यवस्था लगभग मृतप्राय हो, कॉर्पोरेट अपने लिय पैकेज कि मांग कर रहे हैं, उस स्थिति में देश कि सबसे बहुमूल्य खनिज संपदा की नीलामी थोड़ा चौंका देती हैं. सफल नीलामी के लिए उसने बोलीदारों की संख्या पहले से ही मात्र 2 कर दी है, जिससे वर्तमान नीलामी गैर-प्रतिस्पर्धा और कॉर्पोरेट मिली-भगत के साथ सम्पन्न की जा सकती है. ऐसे में चुनिन्दा कंपनियों को भारत का पूरा कोयला कौड़ी के भाव पर बाँट देने जैसा प्रतीत होता है, जिसको नीलामी का अमली-जामा पहनाकर बेचा जा रहा है.

नीलामी में शामिल किए गए खदान भारत के सबसे घने जंगलों और पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थित हैं. इनमें से कई खदानें No-Go / Inviolate क्षेत्रों में हैं जिनको सरकारी दस्तावेज़ों में इतना महत्वपूर्ण माना गया है कि इनका हर स्थिति में संरक्षण किए जाना अत्यंत आवश्यक है (ऐसे क्षेत्र भारत के कुल कोयला क्षेत्रों के 10 प्रतिशत से भी कम हैं). साथ ही इनमें से अधिकांश खदानें आदिवासी बाहुल पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में हैं जहां पेसा कानून 1996 तथा वनाधिकार कानून 2006 के तहत जन-समुदाय को विशेष अधिकार प्राप्त हैं. लेकिन पूर्व के अनुभवों को देखें तो नीलामी के बाद इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विनाश निश्चित है.

शामिल किए गई कोल ब्लॉकों में अधिकांश के पास ना तो पर्यावरणीय या वन-भूमि डायवर्शन स्वीकृति है और ना ही संबन्धित ग्राम सभाओं का सहमति पत्र ऐसे में निश्चित है कि आने वाले समय में इन खदान क्षेत्रों में संघर्ष व संकट बढ़ेगे. झारखंड के मुख्य-मंत्री पहले ही इसका विरोध कर चुके हैं और कहा है कि नीलामी से पूर्व इन क्षेत्रों का समग्र आंकलन ज़रूरी है. हसदेव अरण्य क्षेत्र की ग्राम सभाओं ने इस संबंध में प्रधानमंत्री को पत्र लिखे हैं.

ऐसे में गंभीर सवाल खड़े होते है – ऐसे महत्वपूर्ण इलाकों का बंदरबांट, जन-विरोध के बावजूद क्यों या जा रहा है ? और वो भी कमर्शियल माइनिंग, यानि निजी मुनाफे, के लिए ? वो भी ऐसे संकट-पूर्ण समय में? ये सब किसके हित के लिए किया जा रहा है ?

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