अध्यात्मवास्तु

गलत वास्तु से हो सकती हैं जीवन में ये समस्याएं, छोटे से उपायों से ऐसे कर सकते हैं सुधार

वास्तु शास्त्र हमारे जीवन को पूर्ण रूप से प्रभावित करता है। आवासीय भवन हो या दुकान, कार्यालय, अस्पताल, कारखाना, होटल, विद्यालय, मंदिर। वह उनका उपयोग करने वालों को अच्छी या बुरी तरह प्रभावित करता ही है। जिस प्रकार शरीर में पंच तत्वों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है उसी प्रकार धरती पर किए गए हर निर्माण कार्य में पंचतत्व निहित हैं। वास्तु शास्त्र में इनका ठीक प्रकार संतुलन बनाए रखकर निर्माण कराना वास्तु शास्त्रीय सिद्धांतों का प्रतिपादन है।

भवन प्राकृतिक संसाधनों से युक्त, वास्तु नियमानुसार और पंचतत्व के अनुकूल हो ताकि उनके निवासी रोगमुक्त, सुखी और संपन्न रहें। यही वास्तु शास्त्र का उद्देश्य है। कभी-कभी अनजाने में ऐसा वास्तु दोष उत्पन्न हो जाता है जिससे गृहस्वामी या अन्य सदस्य बीमार हो जाते हैं। मौसमी बीमारी तो सामान्य रूप से ठीक हो जाती हैं, लेकिन असाध्य बीमारी बहुत परेशान करती हैं। ज्योतिषाचार्य पं.शिवकुमार शर्मा से जानिए वास्तु के चलते होने वाले रोग और उपाय‌।

पूर्व दिशा या ईशान कोण में ऊंची और पश्चिम में नीची भूमि नाग पृष्ठ तथा पूरब-पश्चिम में लंबी तथा उत्तर-दक्षिण में ऊंची भूमि में निवास करने वाले लोग स्त्री, पुत्र यदाकदा बीमार रहते ही हैं। उत्तर-पूरब और ईशान में ढलान वाले प्लॉट ही शुभ रहते हैं। यदि आपके घर में  ऐसा नहीं है तो उसे आप फर्श को पूरी तरह समतल करवा सकते हैं। इसके पश्चात घर से बीमारियां दूर चली जाएंगी।

यदि आपका भवन मूसलाकार, गोलाकार, दंडाकार और टी आकार के भूखंड पर बनाया गया है तो वहां के निवासी लगातार बीमारी,तनाव और धन से दुख पाते रहते हैं। इसका वास्तुशास्त्रीय उपाय यह है कि मकान खरीदने से पहले ऐसे भवनों से दूर रहें और ऐसे प्लाट पर मकान न बनाएं। यदि गलती से मकान बन गया है तो अपने पितृ देवता और इष्टदेव का नियमित पूजन करें और घर के उत्तर-पूर्व कोने में भगवान विष्णु की प्रतिमा लगाएं। द्वार पर गणेश जी की प्रतिमा चौखट के ऊपर आगे पीछे लगा दे जिससे ऐसा लगे कि दोनों की पीठ  से पीठ मिली हुई हो।

उत्तर दिशा मातृ स्थान होता है। नवीन  निर्माण कराते समय उत्तर में दक्षिण के अपेक्षा अधिक स्थान खाली छोड़ना आवश्यक है। उत्तर में खाली स्थान नहीं छोड़ा गया और ईशान कटा हुआ है तो उस घर के पुत्र संतान और माता पक्ष किसी न किसी असाध्य बीमारी से पीड़ित हो सकते हैं। ऐसे भवनों को लेने से बचें जिसकी उत्तर दिशा दक्षिण दिशा से भारी हो। ईशान कोण छोटा हो। यदि आपने ऐसा मकान पहले से ही लिया हुआ है तो उत्तर-पूर्व में बड़ा शीशा लगा दें ताकि दिशा भ्रम होकर वह दिशा बढ़ती हुई दिखाई दे।

उत्तर के कमरे में यदि भारीपन है तो उस कमरे उस कमरे में हल्का सामान रखें। घर का सारा भारी सामान दक्षिण या पश्चिम दिशा की ओर रखें। संभव हो तो उत्तर के कक्ष को बच्चों का पढ़ाई कक्ष बना दें।

-घर में ईशान दिशा की मर्यादा अवश्य रखें। ईशान में गंदगी, अग्नि ताप, टॉयलेट्स, स्टोर,कूड़ा कचरा सीढ़ियों का निर्माण या यह भाग घर के अन्य भागों से ऊंचा हो तो यह उस घर की वंश वृद्धि पर ग्रहण लगा देता है या उसकी संतान मंदबुद्धि, अविकसित या स्वच्छंद हो जाती है। ऐसे घर में संतान पक्ष को कोई ना कोई दिमागी बीमारी लगी रहती है। गृह स्वामी के लिए धन का अपव्यय अनावश्यक होता रहता है। ऐसे घरों में यह आवश्यक है कि उस दिशा में उपरोक्त वस्तुओं को तुरंत हटा दिया जाए। ईशान हमारी बुद्धि है। इस दिशा में स्टोर, कूड़ा करकट एवं अग्नि का सामान तो किसी भी कीमत पर ना रखा जाए।

किसी मकान के दक्षिणी नैऋत्य में विथीशूल आती है। अर्थात दक्षिण दिशा  से आकर कोई सड़क उस दक्षिणी दीवार से टकराकर बन्द हो जाती है तो उस भवन की महिलाएं उन्माद एवं मानसिक तनाव से ग्रस्त हो जाती है। उनके दिमाग में आत्महत्या का विचार आना प्रारंभ हो जाता है‌ और यदि आपकी दक्षिण-पश्चिम दिशा में कुआं या सेप्टिक टैंक बना हुआ है तो वहां भी उपरोक्त लोगों की संभावनाएं बनती हैं।

वीथीशूल के उपाय स्वरूप उस दीवार पर एक उत्तल दर्पण लगा दें। इससे उस दिशा से आने वाली नेगेटिव एनर्जी वापस हो जाती है। उस दिशा में छत पर हनुमान जी का एक कपिध्वज लगा दें। दक्षिण पश्चिम के उस कॉर्नर में जहां के मध्य में सड़क टकराती है, वहां कोई ऊंचा पत्थर या कोई भारी निर्माण करा दें। यदि उस दिशा में कोई कुआं , सेप्टिक टैंक या वाटर टैंक बना हुआ है उसे तुरंत बंद कर दें।

यदि घर का वायव्य कोण दक्षिण पूर्व यानी अग्नि कोण से ऊंचा हो तो उस मकान के निवासी विशेषकर पुरुष वर्ग उदर विकार एवं आंत के रोग बवासीर लोगों से परेशान रहते हैं।

ईशान कोण या उत्तर में रसोई बनी हुई है तो वहां के निवासी पेट की बीमारियां अथवा गैस की बीमारियों से सदैव पीड़ित रहेंगे। इसलिए ध्यान रखें ईशान और उत्तर दिशा में रसोई बनाने से बचें।

यदि घर मे रसोई का दूसरा विकल्प नहीं है उसी क्षेत्र को एक इकाई मानकर उसके आग्नेय कोण में ही चूल्हा या गैस रखें। क्रिस्टल बॉल अथवा सेंधा नमक उस दिशा में किसी एक कटोरे में रख दें।

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