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चीन चल रहा गलवान घाटी को भी विवादित बनाने की चाल 

  नई दिल्ली                                                                    
पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा निकट गलवान घाटी क्षेत्र सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। जानकारों के मुताबिक, इस इलाके में एलएसी पर कोई विवाद नहीं रहा है, लेकिन चीन अब यहां भी गतिरोध पैदा करने की साजिश कर रहा है। चीन को डर है कि इस इलाके में भारत की मजबूत पकड़ से तिब्बत तक उसके जाने वाले राजमार्ग को खतरा पहुंच सकता है। गलवान सेक्टर बेहद संवेदनशील है, क्योंकि एलएसी के नजदीक डीएस-डीबीओ रोड से जुड़ता है।

लेह से दौलत बेग ओल्डी तक भारत की सामरिक सड़क दारबुक-श्योक-दौलतबेग ओल्डी (डीएसडीबीओ) गुजरती है। घाटी में भारत की सबसे अग्रिम गश्ती चौकी के तौर पर गलवान फ्लैश प्वाइंट पीपी 14 है, जिसके बेहद समीप चीनी सेना आ गई है। चीन आईटीबीपी पोस्ट से पीपी 14 तक सड़क निर्माण पर विरोध जता रहा है। इस सड़क के जरिये भारत अपनी सामरिक स्थिति को मजबूत करता है।
 
चीन हमेशा सीमावर्ती क्षेत्रों सड़क, पुल, सैन्य ठिकाने बनाकर स्थिति मजबूत करने के बाद विवाद पैदा करता है। 2016 तक चीन ने गलवान घाटी के मध्य बिंदु तक पक्की सड़क बना ली। उसने छोटी-छोटी चौकियों का निर्माण किया। गलवान के पास सबसे ऊंची रिजलाइन श्योक नदी के पास से गुजरती है। श्योक और गलवान नदी का संगम एलएसी से करीब आठ किलोमीटर है। चीन यहां पकड़ मजबूत कर श्योर रूट के दर्रों पर हावी होने की कोशिश में है।

पहले भी चीन ने दिया था धोखा
चीन ने 1962 में भारत की पूर्वी व उत्तरी सीमा पर हमला कर धोखा दिया था। चीन 1959 तक जितने क्षेत्र पर दावा करता था, उसकी तुलना में सितंबर 1962 (युद्ध से एक माह पहले) में वो पूर्वी लद्दाख में अधिक क्षेत्र पर दावा दिखाने लगा। चीन ने 1962 में युद्ध खत्म होने के बाद के दावे के मुकाबले भी ज्यादा क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।
 
इस बार नाकाम हुई चीन की चाल
भारतीय और चीनी सैनिकों का गलवान में पांच मई को आमना-सामना हुआ। माना जाता है कि चीनी सैनिक अपने पीछे के बेस से निकल कर नदी के साथ यात्रा करते हुए एलएसी को पार कर यहां पहुंचे, जहां भारतीय सैनिकों से उन्हें रोक दिया। भारतीयों के कड़े रुख के बाद चीनी सैनिक अपने क्षेत्र में चले गए।

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