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तमिलनाडु के उच्च शिक्षा मंत्री ने दो-भाषा नीति को जारी रखने का किया फैसला

चेन्नै
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में प्रस्तावित तीन-भाषा नीति के विरोध को दोहराते हुए तमिलनाडु के उच्च शिक्षा मंत्री के पी अंबालागन ने कहा है कि राज्य ने दो-भाषा नीति को जारी रखने का फैसला किया है। एनईपी पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को लिखे पत्र में अंबालागन ने कहा, 'तमिलनाडु ने हमेशा दो-भाषा के फार्मूले का पालन किया है, जो एक सफलता रही है।' उन्होंने नैशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की ओर से प्रवेश परीक्षा कराने के प्रस्ताव का भी विरोध किया है। साथ ही कहा कि यह ग्रामीण छात्रों को हतोत्साहित करेगा। तमिलनाडु सरकार इस तरह के प्रस्ताव के लिए तैयार नहीं है। यह छात्रों पर एक अतिरिक्त बोझ होगा।

तमिलनाडु के उच्च शिक्षा मंत्री के पी अंबालागन ने एईपी पर सरकार के प्रारंभिक विचार को व्यक्त करते हुए कहा कि प्रस्तावित नीति में कहा गया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों को क्षेत्रीय भाषा में डिग्री की पेशकश करनी चाहिए, लेकिन इसका पालन पहले से ही तमिलनाडु में हो रहा है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु दो भाषा की नीति का पालन कर रहा है और यह सफल रहा है। इसलिए सरकार ने पहले ही भविष्य में इसे जारी रखने का फैसला ले चुकी है।

NEP पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और सभी वरिष्ठ मंत्रियों से की चर्चा: अंबालागन
मंत्री ने कहा कि हमारा लक्ष्य वर्ष 2035 तक 50 प्रतिशत सकल पंजीकरण अनुपात (जीईआर) हासिल करने का है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के मुताबिक तमिलनाडु में जीईआर 49 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया है और हम जल्द यह लक्ष्य हासिल कर लेंगे। यह बताते हुए कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और सभी वरिष्ठ मंत्रियों के साथ चर्चा की गई थी, अंबालागन ने कहा कि उच्च शिक्षा सचिव की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति बनाई गई थी।

तमिलनाडु ने किया विरोध
तमिलनाडु ने राष्ट्रीय अर्हता सह प्रवेश परीक्षा का विरोध किया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के मुताबिक, 'एनटीए प्रमुख, विशेषज्ञ और स्वायत्त परीक्षा कराने वाला संगठन होगा जो स्नातक, परास्नातक और उच्च शिक्षण संस्थानों में फेलोशिप के लिए परीक्षा कराएगा। एनईपी के मुताबिक एनटीए की उच्च गुणवत्ता, वृहद क्षेत्र और लचीलापन युक्त परीक्षा सेवा से अधिकतर विश्वविद्यालय इस समान प्रवेश परीक्षा का इस्तेमाल कर पाएंगे, बजाय कि प्रत्येक विश्वविद्यालय अपने स्तर पर परीक्षा कराएं जिससे विद्यार्थियों, विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के साथ-साथ पूरे शिक्षण प्रणाली पर से बोझ कम होगा।

 

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