दिल्ली/नोएडाराज्य

दिव्यांग छात्रों को ऑनलाइन शिक्षा में आ रही दिक्कत, आसानी चाहते हैं एनजीओ

नई दिल्ली
कोविड-19 वैश्विक महामारी के मद्देनजर मार्च से लागू लॉकडाउन के बाद से स्कूल एवं कॉलेजों को शिक्षण संबंधी गतिविधियों के लिए ऑनलाइन शिक्षण माध्यमों का सहारा लेने पर मजबूर होना पड़ा है, लेकिन इन नयी व्यवस्था से सामंजस्य बैठाने में काफी विद्यार्थियों को दिक्कत पेश आ रही है, खासकर दिव्यांग विद्यार्थियों को। सेरेब्रल पाल्सी (मांसपेशियों में कड़ेपन से जुड़ा विकार) से पीड़ित एक छात्रा अपने शिक्षकों से कुछ समय से ऑनलाइन संवाद करने में अक्षम है। उसका कहना है कि कई मौकों पर उसे समझ नहीं आता है कि ई-कक्षा में क्या चल रहा है और पढ़ने के लिए उसे अपने सहपाठियों के नोट्स पर निर्भर रहना पड़ता है। एमए की 30 वर्षीय छात्रा ने कहा, “मेरे लिए सभी कक्षाएं एवं असाइनमेंट निजी तौर पर सुलभ हैं। मैं किसी तरह व्यवस्था कर लेती हूं लेकिन जो मदद नहीं लेते उनका क्या?”

शिक्षण पद्धति को डिजिटल रूप लिए हुए अब तीन महीने से ज्यादा का वक्त हो गया। हालांकि कई विशेषज्ञों का कहना है कि देश में सब तक डिजिटल माध्यमों की पहुंच न होने (डिजिटल डिवाइड) से ये ऑनलाइन कक्षाएं बुरे सपने में तब्दील हो सकती हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब 35 करोड़ विद्यार्थी हैं। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इनमें से कितनों के पास डिजिटल उपकरण एवं इंटरनेट तक पहुंच है। सौंदर्य राठी (बदला हुआ नाम), एक बधिर छात्र हैं और वह सुविधाओं में सुधार पर जोर डालते हैं। एलएलबी के 42 वर्षीय छात्र ने कहा, “बधिर छात्र जो सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल करता है उसके लिए सांकेतिक भाषा का दुभाषिया होना चाहिए। बधिर विद्यार्थी से दुभाषिए की उसकी प्राथमिकता के बारे में पूछा जाना चाहिए। दुभाषिया सेवाओं के अनुरोध के लिए आईएसएलआरटीसी से संपर्क किया जाना चाहिए। इसके अलावा, बधिर छात्र से उसकी अन्य जरूरतों के बारे में भी पूछा जाना चाहिए।”

वहीं कई प्रकार की दिव्यांगता से ग्रस्त बेंगलुरु के एक छात्र ने कृत्रिम अंगों का इस्तेमाल करने वाले विद्यार्थियों को आने वाली समस्या को उठाया जो अन्य की तरह प्रभावी ढंग से लैपटॉप पर टाइप नहीं कर सकते या उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते। गैर लाभकारी संगठन, सेंटर फॉर एडडवोकेसी एंड रिसर्च की कार्यकारी निदेशक अखिला शिवदास ने कहा कि सरकार को ऐसी शिक्षा मुहैया कराने की जरूरत है जो दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए भी सुलभ हो। जावेद आबिदी फाउंडेशन के समन्वयक शामीर रिशाद कहते हैं कि सरकार को विभिन्न प्रकार की दिव्यांगता को समझने की जरूरत है।
 

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