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पीएम मोदी ने यूपी रोजगार अभियान की शुरुआत करते हुए पूर्व पीएम नेहरू पर निशाना साधा

 
नई दिल्ली 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश सरकार के ‘आत्मनिर्भर यूपी रोजगार अभियान’ की शुरुआत की. इस दौरान वह पहले की तरह ही इस बार भी कांग्रेस की सरकारों को निशाने पर लेने से नहीं चूके. पीएम मोदी ने शुक्रवार को आत्मनिर्भर यूपी रोजगार अभियान की शुरुआत करते हुए नाम लिए बिना पूर्व पीएम नेहरू पर निशाना साधा.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन के दौरान 1954 में हुए कुंभ में मची भगदड़ के लिए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया. पीएम मोदी ने कहा कि एक दिन था जब इलाहाबाद के सांसद देश के प्रधानमंत्री थे और कुंभ के मेले में भगदड़ मची थी तो हजारों लोग मारे गए थे, तब सरकार ने मरने वालों की संख्या छुपाने में सारा जोर लगा दिया था. पीएम मोदी ने कहा कि यूपी सरकार ने रिस्क उठाते हुए लाखों मजदूरों को वापस बुलाया. अगर पहले की सरकारें होतीं तो अस्पताल की संख्या का बहाना बना देती.

इससे पहले पीएम मोदी लोकसभा चुनाव 2019 में कौशांबी में एक चुनावी जनसंभा को संबोधित करते हुए कहा था कि पंडित नेहरू जब कुंभ मेले में आए थे तब अव्यवस्था के चलते भगदड़ में हजारों लोगों की मौत हो गई थी, लेकिन कांग्रेस ने इस खबर को दबा दिया.
 
प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद इस बात की चर्चा तेज हो गई थी कि क्या वाकई में नेहरू के कुंभ में जाने की वजह से भगदड़ की घटना घटी और क्या तब के अखबारों ने इस खबर को कांग्रेस के दबाव में दबा दिया था. अखबार इसलिए क्योंकि तब भारत में टीवी का दौर नहीं था. खबरों के लिए जनता अखबार और रेडियो पर ही निर्भर थी. हालांकि कुछ वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि भगदड़ की घटना के लिए नेहरू को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इस तर्क के पीछे उनकी दो प्रमुख दलील हैं. पहला नेहरू हादसे के दिन कुंभ में मौजूद ही नहीं थे और दूसरा तब भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आज जैसे इंतजाम करना भी मुश्किल था.

नेहरू की मौजूदगी पर सवाल

वरिष्ठ पत्रकार पीयूष बबेले कहते हैं कि कुंभ में भगदड़ की घटना 3 फरवरी 1954 को हुई थी, जबकि पंडित नेहरू 2 फरवरी को कुंभ मेले में स्नान के लिए पहुंचे थे. कुभ स्नान से बाद नेहरू वहां के इंतजामों से संतुष्ट होकर पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत उसी दिन रवाना हो गए थे. पीयूष नेहरू वांग्मय खंड 25 के हवाले से बताते हैं कि संसद की कार्यवाही का ब्यौरा और नेहरू का संसद में दर्ज भाषण में इस हादसे का जिक्र है.
 
इसमें नेहरू ने कहा था कि हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज के नेतृत्व में हादसे की जांच के लिए कमेटी गठित कर दी गई है. साथ ही वह इसमें मृतकों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं. नेहरू ने सांसदों को यह मुद्दा उठाने के लिए प्रेरित भी किया और मुख्यमंत्रियों को 15 मार्च को लिखे पत्र में इस घटना का जिक्र भी किया.

प्रयागराज के वरिष्ठ पत्रकार नरेश मिश्र के बीबीसी में छपे बयान के मुताबिक पंडित नेहरू भगदड़ से ठीक एक दिन पहले आए थे, उन्होंने संगम में जाकर तैयारियों का जायज़ा लिया और फिर वापस दिल्ली चले गए. लेकिन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद हादसे वाले दिन संगम क्षेत्र में ही थे और सुबह के समय किले के बुर्ज पर बैठकर दशनामी संन्यासियों का जुलूस देख रहे थे. तभी दो पेशवाई जुलूस वहां से गुजरे और इस भीड़ ने भगदड़ की शक्ल ले ली.

घटना को अपनी आंखों से देखने वाले नरेश मिश्र बीबीसी को बताते हैं कि 45 मिनट की ये भगदड़ अपने आप काबू में आ गई, लेकिन तब तक करीब 700-800 लोग मारे जा चुके थे. ये प्रशासन का आंकड़ा था लेकिन मिश्र कहते हैं कि जो देखा था और उसके बाद जो सुना था उस लिहाज से मृतकों की संख्या और ज्यादा रही होगी. उन्होंने बताया कि इस घटना की चर्चा महीनों तक रही और तब के सभी प्रमुख अखबरों ने कुंभ के इस हादसे को कई दिनों तक प्रकाशित किया.

क्या हुआ था उस दिन?

अंग्रेजी अखबार दी स्टेट्समैन में छपे फोटो पत्रकार एनएन मुखर्जी के विवरण के मुताबिक इस भड़दड़ में कम से कम हजार लोगों की मौत हुई थी और दो हजार के करीब घायल हुए थे. मुखर्जी बताते हैं कि मौनी अमवस्या के दिन 3 फरवरी 1954 को भारी संख्या में लोग संगम में पवित्र स्नान के लिए आए हुए थे. मुखर्जी के मुताबिक वह अकेले ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने भगदड़ की तस्वीरें कैमरे में कैद की थीं. उनके मुताबिक चारों तरफ लाशें थीं और लोग मदद की गुहार लगा रहे थे.

हादसे के दो दिन पहले ही हैजा वैक्सीनेशन को बंद कर दिया गया था, इसी वजह से इस दिन बड़ी संख्या में लोग स्नान के लिए संगम क्षेत्र में पहुंच हुए थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को भी इसी दिन स्नान के लिए आना था. इस के मद्देनजर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे. दोनों नेताओं की कार करीब सुबह 10 बजे संगम क्षेत्र में दाखिल होती है और फिर किला घाट के लिए निकल जाती है. भीड़ को काबू करने के लिए बैरियर लगाए गए थे, तभी दूसरी ओर साधुओं की पेशवाई का काफिला वहां से गुजरता है और रस्सियों को तोड़ता हुआ आगे बढ़ चलता है.
 

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