राजनीतिक

शाह फिर राजनीती के चाणक्य साबित हुए ,कांग्रेस से 2017 का किया हिसाब बराबर

अहमदाबाद
गुजरात में राज्यसभा की चार सीटों पर चुनाव के लिए लंबे वक्त से चल रहे सियासी ड्रामे पर वोटिंग के दिन हाई वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला। मतगणना के लिए चली लंबी उठापटक के बाद गुजरात से राज्यसभा की 4 में 3 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने अपना कब्जा जमा लिया, जबकि कांग्रेस के खाते में एक सीट गई। इसी के साथ पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के गृह प्रदेश में बीजेपी ने कांग्रेस से 2017 का हिसाब बराबर कर लिया।

गुजरात में राज्यसभा की 4 सीटों पर मतगणना के लिए चली लंबी उठापटक के बाद शुक्रवार की देर रात भारतीय जनता पार्टी की तरफ से नरहरि अमीन , अजय भारद्वाज , रामिलाबेन बारा चुन लिए गए। वहीं कांग्रेस की तरफ से शक्तिसिंह गोहिल  चुने गए। इससे पहले गुजरात में राज्यसभा की चार सीटों के लिए मतों की गिनती में शुक्रवार को देरी हुई क्योंकि कांग्रेस की मांग थी कि निर्वाचन आयोग विभिन्न आधार पर बीजेपी के 2 मतों को अमान्य करार दे।

गुजरात में विधानसभा की 182 सीटें हैं। बीजेपी के 103, कांग्रेस के 65, भारतीय ट्राइबल पार्टी के 2, एनसीपी के एक और एक निर्दलीय विधायक हैं। संख्या बल के आधार पर पहले यह स्पष्ट था कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों के ही खाते में 2-2 सीटें जाएंगी। हालांकि पिछले चुनावों में 'चाणक्य' की उपाधि से नवाजे गए अमित शाह ने दांव चलना शुरू कर दिया। सुनियोजित तरीके से पिछले कुछ समय में कांग्रेस के कुछ विधायकों ने विभिन्न वजहों से पार्टी का साथ छोड़ दिया। बीजेपी को दूसरा मौका कोरोना वायरस के तौर पर मिल गया, जिससे चुनावों में देर हुई। इससे बीजेपी को अपनी तैयारी और भी पुख्ता करने का पर्याप्त समय मिल गया।

संख्याबल के आधार पर 182 विधायकों में से 10 सीटें खाली थीं। इनमें से 8 कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे की वजह से और 2 कोर्ट केस की वजह से। अब नए समीकरण से बीजीपी को 2 और कांग्रेस को 1 सीटें मिलनी तय हो गई। सारी जोर-आजमाइश चौथी सीट के लिए रही। बीजेपी ने अजय भारद्वाज, रामिलाबेन बारा के साथ ही 'एक्स्ट्रा' प्लेयर के तौर पर नरहरि अमीन को भी मैदान में उतार दिया। लेकिन शुक्रवार को 172 में से भी बीटीपी के 2 विधायकों ने वोट नहीं दिया, जिस वजह से कुल 170 विधायकों के वोट पड़े। राज्यसभा वोटिंग के लिए गणित के आधार पर एक प्रत्याशी के लिए 35 वोट जरूरी था।

गुजरात में राज्यसभा की चार सीटों के लिए शुक्रवार को वोटिंग से पहले भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के दो विधायकों ने वोट न करने का फैसला किया। बीटीपी प्रमुख छोटू वसावा और उनके बेटे महेश वसावा का वोट बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए ही काफी अहम था। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों ही पार्टियों ने एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक समुदाय और प्रवासी श्रमिकों के कल्याण के लिए कुछ नहीं किया। हालांकि इनके वोट न करने से बीजेपी को काफी हद तक फायदा हुआ। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इनके वोट न करने के फैसले से बीजेपी के तीसरे कैंडिडेट नरहरि अमीन की जीत के रास्ते भी खुल गए।

इस बात पर अड़ गई थी कांग्रेस
नेता विपक्ष प्रकाश धनानी ने कहा कि कांग्रेस ने बीजेपी विधायक केसरी सिंह सोलंकी और मंत्री भूपेंद्र सिंह चूडासमा की तरफ से डाले गए मतों को रद्द करने की मांग की थी। धनानी ने कहा, 'जब तक मतगणना को लेकर हमारी शिकायतों को नहीं देखा जाता, काउंटिंग शुरू नहीं होगी। मतदान के बाद हमने अपनी आपत्ति यहां निर्वाचन आयोग के प्रतिनिधि को सौंपी।' एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि निर्वाचन आयोग के पर्यवेक्षक ने विपक्षी दल की आपत्ति को खारिज कर दिया है और मामले पर अंतिम फैसले के लिए उसे आयोग के दिल्ली कार्यालय को संदर्भित किया है। कांग्रेस ने चूडासमा के मतदान करने पर इस आधार पर आपत्ति जताई कि पिछले महीने गुजरात हाई कोर्ट ने उनके चुनाव को रद्द घोषित कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले पर रोक लगा रखी है।

क्या हुआ था 2017 के चुनाव में
वर्ष 2017 में कुछ यही परिस्थिति कांग्रेस नेता अहमद पटेल के सामने आ गई थी। तीन सीटों के लिए हो रहे चुनाव में अमित शाह, स्मृति ईरानी, बलवंत सिंह राजपूत को उम्मीदवार बनाया गया था। कांग्रेस के कई विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी, जिसके बाद अहमद पटेल के लिए अड़चनें बढ़ गई थीं। हालांकि, काफी मशक्कत के बाद अहमद पटेल ने जीत दर्ज की थी और बलवंत सिंह राजपूत को शिकस्त का सामना करना पड़ा था। उस दौरान कांग्रेस विधायकों को अपने पाले में बनाए रखने के लिए कर्नाटक का एक रिजॉर्ट बुक किया गया था। तमाम प्रयोगों के बाद अहमद पटेल ने जीत दर्ज की तो उसे बलवंत सिंह राजपूत की ओर से गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दे दी गई थी। चुनाव आयोग ने दो बागी कांग्रेस विधायकों भोला गोहिल और राघवजी पटेल का वोट अवैध घोषित किया था। आरोप है कि दोनों ने पार्टी के अधिकृत एजेंट के अलावा अपना वोट सार्वजनिक रूप से दिखाया था, जोकि नियमों के खिलाफ है।

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