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GST के तीन साल पूरे,1 जुलाई 2017 को व्यवस्था को लागू किया

नई दिल्ली

देश के ऐतिहासिक टैक्स सुधार की दिशा में वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू हुए तीन साल पूरे हो गए हैं. मोदी सरकार ने 1 जुलाई 2017 को अप्रत्यक्ष कर की इस नई व्यवस्था को लागू किया था. यह टैक्स के मोर्चे पर सुधार का बड़ा कदम था. जीएसटी के वजूद में आने से रोजमर्रा की कई चीजों पर टैक्स की दरें बदल गईं.

जीएसटी को लागू करने के पीछे 5 मकसद थे- महंगाई पर लगाम, अनुपालन बोझ कम होगा, टैक्स चोरी पर लगाम, जीडीपी में इजाफा और टैक्स कलेक्शन बढ़ जाएगा. महंगाई के मोर्चे पर भले ही सरकार को थोड़ी कामयाबी मिली है. लेकिन जीएसटी काउंसिल अभी भी जीएसटी में टैक्स चोरी को रोकने की कवायद में लगी है.

जहां तक जीडीपी में ग्रोथ की बात है तो कहा जा रहा था कि जीएसटी लागू होने से दो फीसदी तक जीडीपी में सुधार देखने को मिलेगा. लेकिन वित्त वर्ष 2019-20 में जीडीपी ग्रोथ पिछले 11 सालों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई. 2017-18 में भारत की जीडीपी 7.2 फीसदी थी, जो 2018-19 में घटकर 6.8 फीसदी हो गई और अब 2019-20 में जीडीपी 4.2 फीसदी दर्ज की गई. यही नहीं, आगे और स्थिति बिगड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है.

अर्थव्यवस्था की गाड़ी पटरी से उतरने की वजह से केंद्र को राज्यों को भी कर का भुगतान करने में परेशानाी हो रही है. जब जीएसटी लागू हुआ था तो उम्मीद की गई थी कि प्रति महीने 1.5 लाख करोड़ रुपये का जीएसटी कलेक्शन होगा. लेकिन तमाम कोशिश के बावजूद कलेक्शन 1 लाख करोड़ रुपये के आसपास ही रहा है. कोरोना संकट की वजह से कलेक्शन और घट सकता है.

तकनीकी खामियों से लोग परेशान

यही नहीं, अभी भी बड़े पैमाने पर लोग जीसीटी को लेकर उधेड़बुन में रहते हैं. इसलिए संभव है कि आने वाले दिनों में सरकार इसे और सरल बनाने पर काम करे. ताकि जिस मकसद से इसे लागू किया गया है, वो पूरा हो सके. हालांकि अब धीरे-धीरे इसकी खामियां दूर हो रही है. इसी हफ्ते से 'निल' रिटर्न दायर करने वाले करदाता SMS के माध्यम से बिक्री का मासिक और तिमाही विवरण 'जीएसटीआर-1' भेज सकेंगे. पिछले तीन वर्षों में सैकड़ों बार जीएसटी कानून में बदलाव किए जा चुके हैं.

जीएसटी का सफर पिछले तीन सालों में काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा. जीएसटी लागू होने पर टैक्स से जुड़े सभी 17 तरह के कानून एक में मिल गए. इस प्रकार देश में सिंगल टैक्सेसन की व्यवस्था लागू हो सकी. पहले वैट शुल्क 14.5 प्रतिशत, उत्पाद शुक्ल 12.5 प्रतिशत देना पड़ता था. सभी टैक्स मिलाकर उपभोक्ताओं को 31 प्रतिशत टैक्स अदा करना पड़ता था. कई रिटर्न दाखिल करने पड़ते थे. कई इंस्पेक्टर्स की भी जांच होती है, जिससे लोगों को छुटकारा मिल गया है.

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